भीड़' नहीं 'जनादेश' चुनिए: भारतीय चुनावी व्यवस्था में तीन बड़े सुधारों की ज़रूरत।
भीड़' नहीं 'जनादेश' चुनिए: भारतीय चुनावी व्यवस्था में तीन बड़े सुधारों की ज़रूरत।
प्रस्तावना:
हाल ही में संपन्न हुए नगर निकाय चुनावों के नतीजे एक गंभीर सवाल खड़े करते हैं। कई वार्डों में विजेता उम्मीदवार को कुल पड़े मतों का मात्र 25-30% हिस्सा ही प्राप्त हुआ है। इसका सीधा मतलब यह है कि 70% जनता उस उम्मीदवार को अपना प्रतिनिधि नहीं मानती थी। क्या यह 'सच्चा लोकतंत्र' है? अब समय आ गया है कि हम अपनी चुनावी प्रक्रिया में तकनीकी और संवैधानिक बदलावों पर विचार करें।
1. उम्मीदवारों की संख्या पर नियंत्रण।
लोकतंत्र में चुनाव लड़ना सबका अधिकार है, लेकिन 'नॉन-सीरियस' उम्मीदवारों की लंबी सूची केवल वोटों का बिखराव करती है।
सुझाव: चुनाव आयोग को उम्मीदवारों के लिए 'न्यूनतम समर्थन' (जैसे क्षेत्र के 5-10% मतदाताओं का पूर्व-समर्थन) अनिवार्य करना चाहिए। इससे केवल वही लोग मैदान में होंगे जिनके पास वास्तव में काम करने का विजन और जनता का आधार है।
2. 60% स्पष्ट बहुमत का अनिवार्य नियम।
किसी भी उम्मीदवार को तब तक 'विजेता' घोषित नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि उसे कुल मतदान का कम से कम 60% वोट न मिले।
सुझाव: यदि पहले चरण में किसी को 60% मत नहीं मिलते, तो शीर्ष दो उम्मीदवारों के बीच 'रन-ऑफ' (दोबारा मतदान) कराया जाना चाहिए। इससे चुना गया प्रतिनिधि सही मायने में पूरे क्षेत्र का 'सर्वसम्मत' नेता होगा।
3. रियल-टाइम 'ऑफलाइन' काउंटिंग तकनीक।
वर्तमान में वोटिंग और गिनती के बीच का अंतराल (Gap) कई तरह के संदेह और हेरफेर की आशंका पैदा करता है।
सुझाव: ईवीएम (EVM) में ऐसे ऑफलाइन सॉफ्टवेयर का उपयोग हो जो वोट डलते ही स्वचालित रूप से गिनती (Excel-style counting) करता रहे। डेटा पूरी तरह सुरक्षित रहे और परिणाम 'इलेक्शन डे' की मध्यरात्रि या अगले दिन सुबह घोषित कर दिए जाएं। इससे मानवीय हस्तक्षेप और चुनावी हिंसा, दोनों पर लगाम लगेगी।
निष्कर्ष:
'The Reformist India' का मानना है कि लोकतंत्र केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का नाम है। यदि हम तकनीक और नियमों में ये सुधार करते हैं, तो हमारे प्रतिनिधि वास्तव में 'जनता की पसंद' होंगे, न कि केवल 'वोटों के गणित' का परिणाम।

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